जिद – जीत की राह या रिश्तों की हार ? || Rishta

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जिद इंसान के जीवन का एक ऐसा गुण है जो परिस्थितियों के अनुसार उसके लिए वरदान भी बन सकता है और अभिशाप भी। बचपन से ही हम सबने यह देखा है कि जब किसी बच्चे को कोई खिलौना चाहिए होता है, तो वह ज़िद करता है और तब तक रोता है जब तक उसे वह खिलौना न मिल जाए। बड़े होते-होते यही प्रवृत्ति अलग-अलग रूप ले लेती है—कभी सपनों और लक्ष्यों के लिए लगन बनकर सामने आती है, तो कभी अहंकार और हठधर्मिता में बदल जाती है।

दरअसल जिद अपने आप में न अच्छी है और न बुरी, बल्कि उसका मूल्य इस बात से तय होता है कि हम किस बात पर अड़े हैं और हमारी जिद का परिणाम हमारे और दूसरों के जीवन पर कैसा असर डालता है। अगर हमारी जिद किसी सही दिशा में है, तो वही जिद मेहनत और लगन का दूसरा नाम बन जाती है।

उदाहरण के तौर पर, दुनिया के लगभग सभी महान वैज्ञानिकों और आविष्कारकों की कहानियाँ बताती हैं कि उन्होंने बार-बार असफल होने के बावजूद हार नहीं मानी, अपनी जिद और लगातार प्रयासों से ही उन्होंने नए आविष्कार किए और विज्ञान को नई दिशा दी।

थॉमस एडीसन ने बल्ब का आविष्कार करने से पहले हज़ारों असफल प्रयोग किए, पर उनकी जिद ने ही उन्हें इतिहास में अमर बना दिया। इसी तरह खिलाड़ी वर्षों तक कठिन अभ्यास करते हैं, चोटें सहते हैं, हार का सामना करते हैं लेकिन उनकी जिद उन्हें मैदान में टिकाए रखती है और यही जिद उन्हें विश्वस्तर पर सम्मान दिलाती है। कलाकार भी दिन-रात अभ्यास करते हैं, बार-बार अस्वीकृति का सामना करते हैं लेकिन उनकी जिद उन्हें एक दिन पहचान दिलाती है। इस दृष्टिकोण से देखें तो जिद ही वह शक्ति है जो इंसान को बार-बार गिरकर भी उठने का हौसला देती है। लेकिन दूसरी ओर यही जिद कई बार बर्बादी का कारण भी बन सकती है।

जब इंसान सिर्फ अपनी बात को सही साबित करने के लिए जिद करता है, चाहे वह सही हो या गलत, तो यह जिद उसके रिश्तों में दरार डाल देती है। अक्सर हम देखते हैं कि रिश्तों में झगड़े और टूटन का कारण भी यही होती है कि कोई एक व्यक्ति अपनी जिद छोड़ने को तैयार नहीं होता। ऐसे में जिद अहंकार का रूप ले लेती है और जीवन को कड़वाहट से भर देती है।

करियर और पढ़ाई में भी अगर इंसान बिना सोचे-समझे किसी गलत रास्ते पर जिद कर ले तो यह उसे नुकसान पहुँचा सकती है, क्योंकि आँख मूँदकर अड़ जाना कभी भी समझदारी नहीं होती। इसलिए ज़रूरी है कि हर बार जब हम किसी बात पर अड़े हों, तो एक शांत दिमाग से विचार करें कि हमारी इस जिद का असर किस दिशा में होगा।

अगर यह असर सकारात्मक है, किसी का भला करेगा, हमें सही रास्ते पर ले जाएगा और हमारे लक्ष्य को पूरा करेगा, तो यह जिद हमारी ताकत बन सकती है। लेकिन अगर इसका असर नकारात्मक है, दूसरों को चोट पहुँचाता है या हमें गलत दिशा में ले जाता है, तो यह जिद छोड़ देना ही समझदारी है।

सही और गलत की पहचान करने का सबसे अच्छा तरीका यह है कि हम अपने निर्णयों को लिखें, खुद से सवाल पूछें कि इसका नतीजा क्या होगा और सोचें कि क्या यह हमें या दूसरों को फायदा देगा। यदि जवाब हाँ में है तो उस जिद को लगन बनाइए, लेकिन यदि जवाब नहीं में है तो उस जिद को त्याग दीजिए। अंततः यही निष्कर्ष निकलता है कि जिद अपने आप में न तो अच्छी है और न बुरी, बल्कि इसका मूल्य इस पर निर्भर करता है कि हम इसे किस दिशा में इस्तेमाल कर रहे हैं।

सही जिद हमें हमारी मंज़िल तक पहुँचा सकती है, हमारे सपनों को साकार कर सकती है और हमें दूसरों के लिए प्रेरणा बना सकती है, जबकि गलत जिद हमें रास्ता भटका सकती है, हमारे रिश्ते छीन सकती है और जीवन को पछतावे से भर सकती है। इसलिए इंसान को हमेशा संतुलन बनाए रखना चाहिए और यह याद रखना चाहिए कि जिद वही अच्छी है जो हमें और हमारे आस-पास के लोगों को सकारात्मक दिशा में ले जाए, बाकी जिद केवल बोझ बन जाती है।

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