परफ़ेक्ट बनने की दौड़ से ज़्यादा ज़रूरी अनुभव || Perfect

Perfect

कभी-कभी मेरे मन में यह सवाल आता है कि क्या हर काम को हमेशा परफ़ेक्ट बनाने की कोशिश करना सही है? जब मैं किसी काम को करता हूँ तो मेरे दिमाग में यही चलता रहता है कि यह बिलकुल सही, बिना गलती और पूरी तरह परफ़ेक्ट होना चाहिए। लेकिन धीरे-धीरे समझ आ रहा है कि हर इंसान की नज़र में परफ़ेक्शन का मतलब अलग होता है। जो चीज़ मेरे हिसाब से अधूरी या कमज़ोर लगती है, वही किसी और को बहुत अच्छी लग सकती है। हाल ही में मेरे साथ ऐसा ही हुआ।

मैं एक पेंटिंग प्रतियोगिता में गया था जहाँ मुझे लाइव पेंटिंग करनी थी। मैं घर से यह सोचकर गया था कि मैं बहुत सारी डिटेल्स डालूँगा, हर चीज़ को बारीकी से सजाऊँगा और अपनी कला को इतना Perfect बनाऊँगा कि कोई कमी न रह जाए। लेकिन जैसे ही प्रतियोगिता शुरू हुई और समय तेज़ी से भागने लगा, वैसे ही मेरी सारी प्लानिंग जैसे बह गई। मैंने उतना डिटेल्ड काम नहीं कर पाया जितना सोचा था।

शुरू में मुझे लगा कि मैं असफल हो गया हूँ क्योंकि मेरी पेंटिंग मेरी अपनी उम्मीदों पर खरी नहीं उतरी। लेकिन जब मैंने लोगों की प्रतिक्रिया देखी तो मैं चौंक गया। जो पेंटिंग मुझे अधूरी लग रही थी, वही लोगों को बहुत आकर्षक लगी। वे मेरे काम की तारीफ़ कर रहे थे और उनमें से कई लोग उस भाव को महसूस कर पा रहे थे जो मैं अपने आर्ट के ज़रिए दिखाना चाहता था। उसी पल मुझे एहसास हुआ कि परफ़ेक्ट बनने की कोशिश हमेशा ज़रूरी नहीं है। असल मायने यह रखते हैं कि आप अपने विचारों और भावनाओं को कितना ईमानदारी से सामने रख पाते हैं।

यहीं से मेरे सोचने का तरीका बदलने लगा। मैंने समझा कि इंसान अगर हर बार परफ़ेक्शन के पीछे भागेगा तो शायद वह कभी काम कर ही नहीं पाएगा। मैंने बहुत से लोगों को यह कहते सुना है कि “मैं अपना काम तभी शुरू करूँगा जब वह पूरी तरह Perfect होगा, वरना नहीं।” और यही सोच सबसे बड़ी रुकावट बन जाती है। इस वजह से कई लोग काम शुरू ही नहीं करते और अपने जीवन में कुछ नया सीखने का मौका गँवा देते हैं। वे इस बात को भूल जाते हैं कि इंसान केवल अनुभवों से ही आगे बढ़ता है। अगर हम कोशिश करेंगे तो हो सकता है पहली बार में वह काम अच्छा न हो, लेकिन वही अनुभव हमें अगली बार बेहतर बनाएगा।

मैं खुद भी पहले इसी जाल में फँसा हुआ था। मुझे लगता था कि अगर मैं अपना काम पूरी तरह परफ़ेक्ट नहीं कर सकता तो मुझे उसे शुरू ही नहीं करना चाहिए। लेकिन ज़िन्दगी ने मुझे यह सिखा दिया कि अनुभव ही परफ़ेक्शन की ओर ले जाते हैं। अगर आप काम करेंगे, गलतियाँ करेंगे, उनसे सीखेंगे और अगली बार कुछ नया अपनाएँगे, तभी आप बेहतर बनेंगे। वरना सोचते-सोचते ही उम्र निकल जाएगी और शुरुआत करने का हौसला भी खो जाएगा।

अब मुझे यह भी समझ आया है कि गलती करना बुरी बात नहीं है। बुरी बात केवल यह है कि हम वही गलती बार-बार दोहराएँ। पहली बार की गलती हमें सिखाती है, दूसरी बार का अनुभव हमें और मज़बूत बनाता है और धीरे-धीरे वही अनुभव हमें उस मुक़ाम तक ले जाता है जिसे हम “परफ़ेक्शन” कहते हैं।

उस पेंटिंग प्रतियोगिता से मैंने यह सीखा कि कला सिर्फ़ बारीकी और तकनीक में नहीं होती, बल्कि उसमें उस सोच और भावनाओं का होना ज़्यादा मायने रखता है जिसे आप सामने लाना चाहते हैं। जब लोग आपके काम से जुड़ जाते हैं और उसमें अपना अक्स देख पाते हैं, तब वही असली परफ़ेक्शन होता है। यह बात केवल कला तक सीमित नहीं है, बल्कि ज़िन्दगी के हर काम में लागू होती है।

अब मेरा नज़रिया बदल चुका है। मैं यह नहीं सोचता कि मुझे हर हाल में Perfect बनना है। अब मैं यह सोचता हूँ कि मुझे हर मौके को अनुभव में बदलना है। क्योंकि यही अनुभव मुझे उस मंज़िल तक ले जाएगा जहाँ मैं अपनी कला और अपने जीवन दोनों को बेहतर बना सकूँ। आज मुझे यह एहसास हो चुका है कि अगर मैं हर दिन कुछ नया सीखता हूँ तो वही मेरी सबसे बड़ी सफलता है। इसलिए अब मैं जब भी कोई मौका देखता हूँ तो परफ़ेक्शन के पीछे भागने के बजाय अनुभव की तलाश करता हूँ।

ज़िन्दगी में हर दिन नया होता है और हर नया दिन हमें कुछ सिखाकर जाता है। अगर हम सिर्फ़ Perfect बनने की चिंता करेंगे तो शायद कभी ज़िन्दगी को जी ही नहीं पाएँगे। इसलिए अब मेरा मानना है कि इंसान को बस चलते रहना चाहिए, सीखते रहना चाहिए और अनुभवों को गले लगाना चाहिए। यही अनुभव धीरे-धीरे हमें उस स्तर तक पहुँचाते हैं जहाँ परफ़ेक्शन अपने आप हमारे साथ हो जाता है।

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