Honest
दुनिया से झूठ बोलना आसान है, लेकिन खुद से झूठ बोलना सबसे खतरनाक होता है। इंसान दूसरों को दिखाने के लिए कई चेहरे बना लेता है, लेकिन धीरे-धीरे वही चेहरा उसकी आदत बन जाता है। वह यह भूल जाता है कि वह असल में क्या चाहता है और क्या नहीं। खुद से ईमानदार होना इसलिए कठिन है क्योंकि इसमें बहाने नहीं चलते।
अक्सर हम अपनी असफलताओं के लिए परिस्थितियों को ज़िम्मेदार ठहरा देते हैं। यह सोच हमें कुछ समय के लिए सुकून देती है, लेकिन भीतर ही भीतर सच्चाई और भारी हो जाती है। जब इंसान खुद की गलती स्वीकार करता है, तभी सुधार की शुरुआत होती है। सच का सामना करना डरावना हो सकता है, लेकिन वही इंसान को मजबूत भी बनाता है।
खुद से ईमानदारी का मतलब यह नहीं कि हम खुद को दोषी मानते रहें। इसका अर्थ है अपनी सीमाओं, कमजोरियों और इच्छाओं को पहचानना। जब इंसान जान लेता है कि वह क्या नहीं कर सकता, तभी वह यह भी समझ पाता है कि उसे किस दिशा में आगे बढ़ना है। यही स्पष्टता जीवन को आसान बनाती है।
रिश्तों में भी ईमानदारी तब आती है, जब इंसान पहले खुद के साथ सच्चा होता है। जो व्यक्ति खुद को समझ नहीं पाता, वह दूसरों को भी ठीक से समझ नहीं पाता। जब हम अपनी भावनाओं को पहचानना सीखते हैं, तब संवाद सरल और सच्चा हो जाता है।
समय के साथ यह एहसास होता है कि दिखावे की ज़िंदगी बहुत थका देती है। जो इंसान खुद से ईमानदार (Honest) होता है, वह कम बोलता है लेकिन साफ़ रहता है। उसे हर किसी को खुश करने की ज़रूरत नहीं पड़ती। उसकी शांति उसके भीतर होती है, बाहर नहीं।
अंत में यही कहा जा सकता है कि खुद से ईमानदार (Honest) होना कठिन ज़रूर है, लेकिन यही आदत इंसान को सच्ची आज़ादी देती है। क्योंकि जिस दिन हम खुद को स्वीकार कर लेते हैं, उसी दिन ज़िंदगी हल्की लगने लगती है।
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