जहाँ दवा काम नहीं आती, वहाँ दुआ काम आती है। || Dua

Dua

मनुष्य का जीवन केवल शरीर तक सीमित नहीं है, बल्कि वह मन, आत्मा और भावनाओं का भी गहरा संगम है। जब हम बीमार पड़ते हैं या जीवन में किसी कठिन परिस्थिति से गुजरते हैं, तो सबसे पहले हम दवा, इलाज और बाहरी उपायों की ओर दौड़ते हैं। यह स्वाभाविक भी है, क्योंकि विज्ञान ने हमें अनेक सुविधाएँ दी हैं। लेकिन जीवन में कई ऐसे मोड़ आते हैं जहाँ दवा भी असहाय हो जाती है, तब मनुष्य को यह एहसास होता है कि कहीं न कहीं एक ऐसी शक्ति है जो दिखती नहीं, लेकिन महसूस जरूर होती है। इसी सच्चाई को यह सुविचार दर्शाता है कि “जहाँ दवा काम नहीं आती, वहाँ दुआ काम आती है।”

दवा शरीर को ठीक करने का प्रयास करती है, लेकिन दुआ आत्मा को मजबूत बनाती है। कई बार बीमारी केवल शारीरिक नहीं होती, वह मानसिक और भावनात्मक भी होती है। तनाव, भय, निराशा और अकेलापन ऐसी समस्याएँ हैं जिनका इलाज सिर्फ गोलियों से संभव नहीं है। ऐसे समय में जब कोई अपने ईश्वर, अपने विश्वास या अपनी अंतरात्मा से जुड़ता है, तो मन को एक अलग ही शांति मिलती है। यही शांति धीरे-धीरे जीवन को सही दिशा में ले जाने लगती है।

दुआ का अर्थ केवल ईश्वर से कुछ माँगना नहीं है, बल्कि अपने भीतर सकारात्मक ऊर्जा जगाना भी है। जब इंसान सच्चे मन से प्रार्थना करता है, तो उसका आत्मविश्वास बढ़ता है। वह यह महसूस करता है कि वह अकेला नहीं है, कोई शक्ति उसके साथ खड़ी है। यह विश्वास ही कई बार असंभव को संभव बना देता है। इतिहास और वर्तमान दोनों में ऐसे अनेक उदाहरण मिलते हैं जहाँ डॉक्टरों ने जवाब दे दिया, लेकिन विश्वास और दुआ ने चमत्कार कर दिखाया।

आज की तेज़ रफ्तार जिंदगी में इंसान हर समस्या का समाधान तुरंत चाहता है। अगर परिणाम देर से मिले तो वह टूटने लगता है। ऐसे समय में दुआ हमें धैर्य सिखाती है। वह हमें यह समझाती है कि हर चीज़ हमारे नियंत्रण में नहीं होती और कुछ बातों को समय और ईश्वर पर छोड़ देना ही बेहतर होता है। यह स्वीकार करना जीवन को हल्का बना देता है।

दुआ का एक और बड़ा महत्व यह है कि वह इंसान को विनम्र बनाती है। जब हम यह मान लेते हैं कि हम सब कुछ नहीं कर सकते, तब हमारे अंदर अहंकार कम होता है और करुणा बढ़ती है। यही करुणा हमें बेहतर इंसान बनाती है। दुआ हमें दूसरों के दर्द को समझना सिखाती है और उनके लिए भी अच्छा सोचने की प्रेरणा देती है।

यह कहना गलत होगा कि दवा और दुआ एक-दूसरे की विरोधी हैं। वास्तव में दोनों का संतुलन ही जीवन को पूर्ण बनाता है। जहाँ दवा शरीर को सहारा देती है, वहीं दुआ मन और आत्मा को शक्ति प्रदान करती है। जब दोनों साथ होती हैं, तो इंसान हर परिस्थिति का सामना अधिक मजबूती से कर पाता है।

अंत में यही कहा जा सकता है कि जीवन में हर समस्या का समाधान केवल बाहरी साधनों में नहीं होता। कई बार समाधान भीतर छिपा होता है। जब रास्ते बंद लगें, उम्मीद कमजोर पड़ने लगे और समाधान दिखाई न दे, तब एक सच्ची दुआ नया मार्ग खोल सकती है। सच ही कहा गया है—जहाँ दवा काम नहीं आती, वहाँ दुआ काम आती है।

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