Nature
कई बार हम अपनी रोज़मर्रा की ज़िंदगी में इतने व्यस्त हो जाते हैं कि यह भूल जाते हैं कि हमारी साँसों का आधार क्या है। जिस हवा में हम सांस लेते हैं, जिस धरती पर चलते हैं, जिस आसमान के नीचे अपनी उम्मीदें पालते हैं—वह सब हमारी प्रकृति का ही हिस्सा है। लेकिन अफ़सोस, हम उसी प्रकृति को नजरअंदाज कर देते हैं जो हमारी हर ज़रूरत को बिना शिकायत पूरा करती है।
आज इंसान ने तकनीक और विकास की दौड़ में इतना आगे बढ़ने की कोशिश की है कि पीछे छूट गया है तो सिर्फ़ उसका अपने पर्यावरण से जुड़ाव। पेड़ कट रहे हैं, नदियाँ गंदी होने लगी हैं, हवा जहरीली बनती जा रही है और धरती का तापमान हर साल पहले से अधिक गर्म हो रहा है। यह बदलाव अचानक नहीं आते—ये धीरे-धीरे हमारी आदतों, हमारी उपेक्षा और हमारी गलतियों से पैदा होते हैं। मौसम का असंतुलन, अनियमित बारिश, सूखा और अचानक बाढ़ें हमें चेतावनी देती हैं कि प्रकृति अब हमसे नाराज़ होने लगी है।
प्रकृति कोई निर्जीव वस्तु नहीं, बल्कि एक संवेदनशील और जीवंत अस्तित्व है। हम जिस तरह किसी इंसान के दर्द को महसूस कर सकते हैं, उसी तरह प्रकृति भी हमारे द्वारा दी गई चोट का असर दिखाती है—कभी बदलते मौसम के रूप में, कभी प्रदूषण के रूप में और कभी प्राकृतिक आपदाओं के रूप में। हवा का खराब होना हमारे फेफड़ों को नुकसान पहुंचाता है, पानी का प्रदूषण बच्चों की सेहत को खतरा बन जाता है, और मिट्टी की गुणवत्ता का खराब होना हमारे भोजन के भविष्य पर असर डालता है। इसलिए प्रकृति की रक्षा करना कोई विकल्प नहीं, बल्कि हमारी सबसे बड़ी जिम्मेदारी है।
छोटे-छोटे कदम बड़े बदलाव की शुरुआत बन सकते हैं। अगर हर व्यक्ति अपने हिस्से का एक पेड़ भी लगाए, तो हर साल लाखों नए पेड़ धरती को नई सांस दे सकते हैं। अगर हम प्लास्टिक कम इस्तेमाल करें, कचरे को अलग-अलग फेंकें, पानी बचाएं और बिजली की बर्बादी रोकें—तो यह कदम हमारे पर्यावरण को एक नई दिशा दे सकते हैं।
प्रकृति हमेशा हमें देती है—बिना किसी मांग के, बिना किसी शर्त के। लेकिन अब वक्त है कि हम भी इसे कुछ वापस दें। हम जितना प्रकृति का ख्याल रखेंगे, उतना ही सुरक्षित भविष्य हम अपनी आने वाली पीढ़ियों तक पहुंचा पाएंगे।
हम यह भी भूल जाते हैं कि प्रकृति का हर हिस्सा—चाहे वह मिट्टी हो या हवा—हमारे भीतर भी मौजूद है। जिस तरह पेड़ बिना पानी के सूख जाते हैं, उसी तरह इंसान बिना स्वच्छ पर्यावरण के धीरे-धीरे कमजोर हो जाता है। जब कभी आप किसी नदी, जंगल या पहाड़ के पास जाते हैं, तो जो शांति महसूस होती है—वह इसलिए नहीं कि जगह सुंदर है, बल्कि इसलिए कि हम अपनी जड़ों के करीब पहुँच जाते हैं। वह सुकून न मशीनें दे सकती हैं, न शहर की भागदौड़।
लेकिन यह शांति और संतुलन हमेशा बना रहे, इसके लिए जागरूकता ज़रूरी है। पर्यावरण की रक्षा सरकार, संगठन या किसी एक व्यक्ति का काम नहीं—यह हर इंसान का दायित्व है। अगर हम अपने घरों और आसपास से शुरुआत करें—कचरा न फैलाएँ, पेड़ लगाएँ, पानी की कद्र करें, प्लास्टिक का प्रयोग कम करें—तो धरती का संतुलन एक बार फिर मजबूत हो सकता है। आने वाली पीढ़ियाँ तभी इस धरती पर सांस ले पाएंगी जब हम आज उसके लिए कुछ करेंगे।
अंत में यही कहा जा सकता है कि प्रकृति सिर्फ़ संसाधन नहीं – हमारा घर है, हमारा भविष्य है। अगर हमने इसे नहीं बचाया, तो हम खुद का भविष्य खो देंगे। इसलिए याद रखिए – “प्रकृति की रक्षा, जीवन की रक्षा है।”
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